श्री जम्भेश्वर भगवान् के उपदेश ॐ ….

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Guru Jambheshwar

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जाम्भोजी का जन्म सन् 1451 ई० में नागौर जिले के पीपासर नामक गाँव में हुआ था। ये जाति से पंवार राजपूत थे। इनके पिता का नाम लोहाट जी और माता का नाम हंसा देवी ( केशर ) था । ये अपने माता – पिता की इकलौती संतान थे। अत: माता – पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे।जाम्भोजी बाल्यावस्था से मौन धारण किये हुए थे ।तत्पश्चात् उनका साक्षात्कार गुरु से हुआ। उन्होंने सात वर्ष की आयु से लेकर 27 वर्ष की आयु तक गाय चराने का काम किया। माता-पिता की स्वर्गवास के बाद जाम्भोजी ने अपना घर त्याग कर पवित्र समराथल धोरा (बीकानेर) आप पधारे थे / यहाँ आप ने 34 वर्ष की आयु में कार्तिक वादी आठामं (जन्मस्थ्मीं )सन् 1485 (वि सवंत १५४२) के दिन समराथल धोरे पर पवित्र पाहल बनाकर विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की तथा 51 वर्ष तक वहीं पर सत्संग एवं विष्णु नाम में अपना समय गुजारते रहे।तथा देश विदेशों में धर्म का पर्चार किया. इसका परमान गुरुशब्द शं.29 में उल्लेख किया है

“गुरु के शब्द असंख्य परबोधी ,खारसमंद परिलो,,
खारसमंद परे प्रेरे चोखंड खारु,पहला अंत न पारुं,,
अनंत करोड़ गुरु की दावन विलम्बी,करनी साच तिरोलो ,,//
उन्होंने उस युग कीसाम्प्रदायिक संकीर्णता, कुप्रथाओं एवं अंधविश्वासों का विरोध करते हुए कहा था कि -
”सुण रे काजी, सुण रे मुल्लां, सुण रे बकर कसाई।
किणरी थरणी छाली रोसी, किणरी गाडर गाई।।
धवणा धूजै पहाड़ पूजै, वे फरमान खुदाई।
गुरु चेले के पाए लागे, देखोलो अन्याई।।”
वे सामाजिक दशा को सुधारना चाहते थे, ताकि अन्धविश्वास एवं नैतिक पतन के वातावरण को रोका जा सके और आत्मबोध द्वारा कल्याण का मार्ग अपनाया जा सके। संसार के मि होने पर भी उन्होंने समन्वय की प्रवृत्ति पर बल दिया। दान की अपेक्षा उन्होंने ‘ शील स्नान ‘ को उत्तम बताया। उन्होंने पाखण्ड को अधर्म बताया । उन्होंने पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बल दिया। ईश्वर के बारे में उन्होंने कहा-
”तिल मां तेल पोह मां वास,पांच पंत मां लियो परकाश ।”
जाम्भोजी ने गुरु के बारे में कहा था -”पाहण प्रीती फिटा करि प्राणी, गुरु विणि मुकति न आई।”
भक्ति पर बल देते हुए कहा था -”भुला प्राणी विसन जपोरे,मरण विसारों केहूं।”
जाम्भोजी ने जाति भेद का विरोध करते हुए कहा था कि – “उत्तम कुल में जन्म लेने मात्र से व्यक्ति उत्तम नहीं बन सकता, इसके लिए तो उत्तम करनी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा “तांहके मूले छोति न होई।दिल-दिल आप खुदायबंद जागै,सब दिल जाग्यो लोई।”
तीर्थ यात्रा के बारे में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था :”अड़सठि तीरथ हिरदै भीतर, बाहरी लोकाचारु।”
मुसलमानों के बांग देने की परम्परा के बारे में उन्होंने कहा था -”दिल साबिति हज काबो नेड़ौ, क्या उलवंग पुकारो।”
जाम्भोजी १५२६ ई० में तालवा नामक ग्राम में परलोक सिधार गए। ओर उनको वहां समाधी दी गयी उस दिन से उस जगह का नाम मुक्तिधाम मुकाम पड़ गया . उनकी स्मृति में विश्नोई भक्त फान्गुन मास की त्रियोदशी को वहाँ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ओर पर्ती वर्ष आसोज व फाल्गुन महीने की अमावस्या को मेला भरता है जहाँ देश के हर कोने से विश्नोई शर्धालू आते है .जाम्भोजी की शिक्षाएँ, सबदवाणी एवं उनका नैतिक जीवन मध्य युगीन धर्म सुधारक प्रवृत्ति के प्रमुख अंग हैं।
विश्नोई सम्प्रदाय.जाम्भोजी द्वारा प्रवर्तित इस सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए उनतीस नियमों का पालन करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है
“उणतीस धर्म की आंकड़ी, हृदय धरियो जोय। जाम्भोजी जी कृपा करी नाम विश्नोई होय ।”
जाम्भोजी ने उन्तिश नियम बताये जो निम्न पर्कार है
१) प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करना। २) ३० दिन जनन – सूतक मानना। ३) ५ दिन रजस्वता स्री को गृह कार्यों से मुक्त रखना। ४) शील का पालन करना। ५) संतोष का धारण करना। ६) बाहरी एवं आन्तरिक शुद्धता एवं पवित्रता को बनाये रखना। ७) तीन समय संध्या उपासना करना। ८) संध्या के समय आरती करना एवं ईश्वर के गुणों के बारे में चिंतन करना। ९) निष्ठा एवं प्रेमपूर्वक हवन करना। १०) पानी, ईंधन व दूध को छान-बीन कर प्रयोग में लेना। ११) वाणी का संयम करना। १२) दया एवं क्षमाको धारण करना। १३) चोरी, १४) निंदा, १५) झूठ तथा १६) वाद – विवाद का त्याग करना। १७) अमावश्या के दिनव्रत करना। १८) विष्णु का भजन करना। १९) जीवों के प्रति दया का भाव रखना। २०) हरा वृक्ष नहीं कटवाना। २१) काम, क्रोध, मोह एवं लोभ का नाश करना। २२) रसोई अपने हाध से बनाना। २३) परोपकारी पशुओं की रक्षा करना। २४) अमल, २५) तम्बाकू, २६) भांग २७) मद्य तथा २८) नील का त्याग करना। २९) बैल को बधिया नहीं करवाना।
जाम्भोजी की शिक्षाओं का आज के वैज्ञानिकों पर भी परभाव पड़ रहा है। उन्होंने अहिंसा एवं दया का सिद्धान्त तथा पर्यावरण के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया .विश्नोइयों ने ने मुर्दों को गाड़ना, विवाह के समय मुहूर्त नहीं निकालना आदि सिद्धान्त ग्रहण किये हैं। उनकी शिक्षाओं पर वैष्णव सम्प्रदाय , कबीर व नानकपंथ का भी बड़ा प्रभाव है।”इस प्रकार जाम्भोजी ने वैष्णव, जैन, इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों का समन्वय करके एक सार्वभौमिक पंथ “विश्नोई” को जन्म दिया।”
DIKSHAविधि : जो व्यक्ति इस सम्प्रदाय के २९ नियमों का पालन करने के लिए तैयार होता था , इसे दीक्षा दी जाती थी। दीक्षा मंत्र तारक मंत्र या गुरु मंत्र कहलाता था, जो इस प्रकार था –”ओं शब्द गुरु सुरत चेला, पाँच तत्व में रहे अकेला।
सहजे जोगी सुन में वास, पाँच तत्व में लियो प्रकाश।।
ना मेरे भाई, ना मेरे बाप, अलग निरंजन आप ही आप।
गंगा जमुना बहे सरस्वती, कोई- कोई न्हावे विरला जती।।
तारक मंत्र पार गिराय, गुरु बताओ निश्चय नाम।
जो कोई सुमिरै, उतरे पार, बहुरि न आवे मैली धार।।
अमृत पाहल विश्नोई सम्प्रदाय में गुरु दीक्षा एवं होली पाहल आदि संस्कार साधुओं द्वारा सम्पादित करवाये जाते हैं, जिनमें कुछ महन्त भी भाग लेते हैं। वे महन्त, स्थानविशेष की गद्दी के अधिकारी होते हैं
थापन नामक वर्ग के लोग नामकरण, विवाह एवं अन्तयेष्टि आदि संस्कारों को सम्पादित करवाते हैं। चेतावनी लिखने एवं समारोहों के अवसरों पर गाने बजाने आदि कार्यों के लिए गायनआचार्य अलग होते हैं।
अभिवादन का तरीका :इस सम्प्रदाय में परस्पर मिलने पर अभिवादन के लिए ‘नवम प्रणाम’, तथा प्रतिवचन में’ विष्णु नै जांभौजी नै’ कहा जाता है। व बडों का पैर छूकर आभिवादन किया जाता है .
विशिष्ट वेशभूषा :रिपोर्ट मर्दुमशुमार राज. मारवाड़ से पता चलता है कि विश्नोई औरतें लाल और काली ऊन के कपड़े पहनती thi । विश्नोई लोग नीले रंगके कपड़े पहनना पसंद नहीं करते हैं। वे ऊनी वस्र पहनना अच्छा मानते हैं, क्योंकी उसे पवित्र मानते हैं। साधु कान तक आने वाली तीखी जांभोजी टोपी एवं चपटे मनकों की आबनूस की काली माला पहनते हैं। महन्त प्राय: धोती, कमीज और सिर पर भगवा साफा बाँधते हैं। लेकिन अब समय के साथ वेशभूषा में भी बदलाव आया है .
संस्कार : विश्नोईयों में शव को गाड़ने की प्रथा प्रचलित है।विश्नोई सम्प्रदाय मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता है। जाम्भोजी ने विश्नोई समाज को तीन संस्कार बताये थे /अत: जाम्भोजी के मंदिर और साथरियों में किसी प्रकार की मूर्ति नहीं होती है। कुछ स्थानों पर इस सम्प्रदाय के सदस्य जाम्भोजी की वस्तुओं की पूजा करते हैं। जैसे कि पीपसार में जाम्भोजी की खड़ाऊ जोड़ी, मुकाम में टोपी, पिछोवड़ों जांगलू में भिक्षा पात्र तथा चोला एवं लोहावट में पैर के निशानों की पूजा की जाती है। वहाँ प्रतिदिन हवन – भजन होता है और विष्णु स्तुति एवं उपासना, संध्यादि कर्म तथा जम्भा जागरण भी सम्पन्न होता है।
विश्नोई समाज का प्रभाव : विश्नोई लोग जात – पात में विश्वास नहीं रखते। अत: हिन्दू -मुसलमान दोनों ही जाति के लोग इनको स्वीकार किया हैं। श्री जंभ सार लक्ष्य से इस बात की पुष्टि होती है कि सभी जातियों के लोग इस सम्प्रदाय में दीक्षीत हुए। उदाहरणस्वरुप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तेली, धोबी, खाती, नाई, डमरु, भाट, छीपा, मुसलमान, जाट, एवं साईं आदि जाति के लोगों ने मंत्रित जल (पाहल) लेकर इस सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण की।
तीर्थ स्थल ; राजस्थान में जोधपुर,जालोर,बाड़मेर ,जैसलमेर ,नागौर ,गंगानगर,भीलवाडा,उदयपुर तथा बीकानेर राज्य में बड़ी संख्या में इस सम्प्रदाय के मंदिर और साथरियां बनी हुई हैं।मुक्तिधाम मुकाम (तालवा) बीकानेर नामक स्थान पर इस सम्प्रदाय का विशाल मंदिर बना हुआ है। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन की अमावश्या को एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं। इस सम्प्रदाय के अन्य तीर्थस्थानों में जांभोलाव, पीपासार, संभराथल, जांगलू,लोहावर, लालासार आदि तीर्थ विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। इनमें जांभोलाव विश्नोईयों का तीर्थराज तथा संभराथल मथुरा और द्वारिका के सदृश माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त रायसिंह नगर, पदमपुर, चक, पीलीबंगा, संगरिया, तन्दूरवाली, श्रीगंगानगर, रिडमलसर, लखासर, कोलायत (बीकानेर), लाम्बा, तिलवासणी, अलाय (नागौर)एवं पुष्कर आदि स्थानों पर भी इस सम्प्रदाय के छोटे -छोटे मंदिर बने हुए हैं। इस सम्प्रदाय का राजस्थान से बाहर भी प्रचार हुआ। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश,महारास्त्र ,कर्नाटका ,देल्ही आदि राज्यों में बने हुए मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं।
जाम्भोजी की शिक्षाओं का विश्नोईयों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। इसीलिए इस सम्प्रदाय के लोग न तो मांस खाते हैं और न ही शराब पीते हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी ग्राम की सीमा में हिरण या अन्य किसी पशु का शिकार भी नहीं करने देते हैं।इस सम्प्रदाय के सदस्य पशु हत्या किसी भी कीमत पर नहीं होने देते हैं। बीकानेर राज्य के एक परवाने से पता चलता है कि तालवा के महंत ने दीने नामक व्यक्ति से पशु हत्या की आशंका के कारण उसका मेढ़ा छीन लिया था।व्यक्ति को नियम विरुद्ध कार्य करने से रोकने के लिए प्रत्येक विश्नोई गाँव में एक पंचायत होती थी। नियम विरुद्ध कार्य करने वाले व्यक्ति को यह पंचायत धर्म या जाति से पदच्युत करने की घोषणा कर देती थी। उदाहरणस्वरुप संवत् २००१ में बाबू नामक व्यक्ति ने रुडकली गाँव में मुर्गे को मार दिया था, इस पर वहाँ पंचायत ने उसे जाति से बाहर कर दिया था। इस सम्प्रदाय के जिन स्री – पुरुषों ने खेजड़े और हरे वृक्षों को काटा था, उन्होंने स्वेच्छा से आत्मोत्सर्ग किया है। इस बात की पुष्टि जाम्भोजी सम्बन्धी साहित्य से होती है। इस सम्प्रदाय के जिन स्री – पुरुषों ने खेजड़े और हरे वृक्षों को काटा था, उन्होंने स्वेच्छा से आत्मोत्सर्ग किया है। इस बात की पुष्टि जाम्भोजी सम्बन्धी साहित्य से होती है।

महाधिवेशन – ग्रामीण पंचायतों के अलावा बड़े पैमाने पर भी विश्नोईयों का एक महाधिवेशन होता है, जो जांभोलाव एवं मुकाम पर आयोजित होने वाले सबसे बड़े मेले के अवसर पर बैठती थी। इसमें इस सम्प्रदाय के बने हुए नियमों के पालन करने पर जोर दिया जाता है। विभिन्न मेलों के अवसर पर लिये गये निर्णयों से पता चलता है कि इस पंचायत की निर्णित बातें और व्यवस्था का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है और जो व्यक्ति इसका उल्लंघन करता है , उसे विश्नोई समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। विश्नोई गाँव में कोई भी व्यक्ति खेजड़े या शमी वृक्ष की हरी डाली नहीं काट सकता ।राजस्थान के शासकों ने भी इस सम्प्रदाय को मान्यता देते हुए हमेशा उसके धार्मिक विश्वासों का ध्यान रखा है। यही कारण है कि जोधपुर व बिकानेर राज्य की ओर से समय – समय पर अनेक आदेश गाँव के पंचायतों को दिए गए हैं, जिनमें उन्हें विश्नोई गाँवों में खेजड़े न काटने और शिकार न करने का निर्देश दिया गया है। बीकानेर ने संवत् १९०७ में कसाइयों को बकरे लेकर किसी भी विश्नोई गाँव में से होकर न गुजरने का आदेश दिया। बीकानेर राज्य के शासकों ने समय – समय पर विश्नोई मंदिरों को भूमिदान दिए गए हैं। ऐसे प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि सुजानसिंह ने मुकाम मंदिर को ३००० बीघा एवं जांगलू मंदिर को १००० बीघा जमीन दी थी। बीकानेर ने संवत् १८७७ व १८८७ में एक आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार थापनों से बिना गुनाह के कुछ भी न लेने का निर्देश दिया था। इस प्रकार जोधपुर राज्य के शासक ने भी विश्नोईयों को जमीन एवं लगान के सम्बन्ध में अनेक रियायतें प्रदान की थीं। उदयपुर के महाराणा भीमसिंह जी और जवानसिंह जी ने भी जोधपुर के विश्नोईयों की पूर्व परम्परा अनुसार ही मान – मर्यादा रखने और कर न लगाने के परवाने दिये थे।
सन् 1536 मिगसर वदी आठम को श्री देव लालासर में निर्वाण को प्राप्त हुए /

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GREENING OF THE DUNES

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Is it a desert or green state? Rajasthan’s identity is undergoing a change. Find out why

Over the last 500 years, the sand dunes of the desert state of Rajasthan have been becoming greener by the day. What could be the reason for this?

Could it be that the overall pattern of monsoon has undergone a drastic change?
These days in Rajasthan, it rains earlier than before, and for a longer period. This alone has brought about greening of an unprecedented scale.

The second reason is that irrigation facilities have improved by the decade.
So there’s plenty of water available right through the year, even in the lands adjoining the unforgiving Thar desert.
Moving on Another reason is the crossover of sand dunes and the mainland. Over the years, sand dunes have shifted to the mainland little by little due to wind currents. And vice versa. This has lead to the blending of sand and soil, that is good for agriculture.

But to me the most poetic reason is the existence of a community called the Bishnois. This is perhaps the only community anywhere in the world that was founded on the principles of conservation. A community that could have come into existence only in a desert, where the dream of every sand dune is a lone green leaf.

Lord Jambheshwar, the sage who founded this community, realised the importance of conservation over five centuries ago. And the epicentre of his conservation efforts was a place called Rotu.

At that time this place was as barren as a desert, and the lone vegetation here was a completely dried up tree.

When the Lord came here, he tied his horse to this dead tree and alighted. The moment his feet touched the ground, village folklore has it that the dead tree sprouted leaves. The villagers who witnessed this miracle prayed for more trees that would give them shade.

As an answer to their prayer, Jambheshwar planted 3,700 `full grown’ khejri trees in that village and its environs. And he told them that these trees would attract birds from neighbouring villages and they would rest there in the night and sing beautiful songs for them in the morning.

These trees would bring in rains, he said, which in turn would give birth to more trees. And today, the entire district of Jodhpur has vast stretches of land dotted with khejri trees.

The Bishnois worship this tree, just as the Hindus worship the peepal or the banyan tree. As a sect, they are prohibited from worshipping idols. But they make up for it by worshipping thousands of these trees that are an integral part of their life.
They revere it so much that no branch is ever chopped off from the tree. Even for firewood, they only collect dead branches from dead trees.

Interestingly, that’s also the best way to identify a Bishnoi village from a mile.
After stretches of villages where lopped trees gaze woefully at you, if you come across a land with full grown khejri trees, you can be sure you are approaching a warm, friendly Bishnoi village! The importance of a khejri tree is that it grows very slowly, almost painstakingly.
In 10 years, a tree would barely grow two inches thick.
It attains its full glory only when it grows to be at least 100 years old. And it’s probably the only tree that allows vegetation to grow under its canopy, proving the adage that nothing grows in the shade absolutely wrong!

Small wonder that the Bishnois have been worshipping this tree as a miracle of Nature. Here’s wishing that the rest of us take a leaf out of this 500-year-old effort.

Input:PC. BISHNOI

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हरियाणा में ‘लाल युग’ का अंत

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चंडीगढ़. ..बड़े गौर से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते..

कहावत है कि ‘हरियाणा में सिर्फ तीन लाल। देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल।’ राजनीतिक धुरंधर भजनलाल के निधन के साथ ही हरियाणवी सियासत का लाल युग भी समाप्त हो गया। राजनीति से लेकर बॉलीवुड तक चर्चित लालों की राजनीति की अंतिम धुरी 81 वर्षीय भजनलाल शुक्रवार को आखिरी बार लोगों के बीच सशरीर मौजूद थे।

सियासी विरोधी भी थे मृदुभाषा के कायल

नई दिल्ली. पाकिस्तान के बहावलपुर में पैदा होने के बावजूद आदमपुर पंचायत में पंच से सियासी सफर की शरुआत करने वाले इस कुशल राजनेता ने सियासत की तमाम बुलंदियां हासिल कीं, लेकिन पद का दंभ उन्हें कभी छू तक नहीं पाया। एक कुशल राजनेता, अनुभवी प्रशासक के साथ-साथ उनकी मृदुभाषा के कायल उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि सियासी विरोधी भी थे।

अपने रणनीतिक कौशल के बूते कठिन से कठिन हालात से साफ बच निकलने के फन में माहिर भजनलाल ने ‘नेवर से डाई’ की अवधारणा पर काम करते हुए जीवन के अंतिम पल तक हार नहीं मानीं। खराब सेहत के बावजूद 2009 के चुनाव में संपत सिंह व जयप्रकाश जैसे दिग्गजों को एक साथ पटखनी देकर उन्होंने अपने कौशल का प्रमाण दिया।

कई फैसले ऐसे, जो आज भी जुबान पर

चंडीगढ़. भजनलाल जैसे धुरंधर नेताओं की राजनीतिक कहानी कभी खत्म नहीं होती, बल्कि इतिहास बन जाती है। इस नेता के फैसले आज भी जन-जन, अफसरशाही और राजनेताओं की जुबान पर हैं। राजीव गांधी सरकार में पर्यावरण मंत्री रहते उन्होंने यमुना-गंगा जल शुद्धिकरण की योजना शुरू की। भजनलाल के मुख्यमंत्री काल के बारे में एक वरिष्ठ अफसर बताते हैं कि मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहला फैसला सफाई कर्मियों के वेतन में सौ रुपए का इजाफा करने का लिया। इससे श्रमिक वर्ग में उनकी अच्छी-खासी पैठ बन गई। पेयजल योजना और तीन किलोमीटर के दायरे में स्कूल जैसे निर्णय भजनलाल ने ही लिए थे।

केंद्र सरकार में थी अच्छी-खासी पैठ

चंडीगढ़. साधारण पंच के रूप में राजनीतिक मैदान में उतरे भजनलाल एक दिन केंद्र सरकार में जबरदस्त पैठ बना लेंगे, यह शायद उनके अलावा किसी ने नहीं सोचा होगा। उन पर राजीव गांधी को इतना भरोसा था कि उन्हें अपने प्रदेश के अलावा राजस्थान की भी कमान दी गई थी। यह अलग बात है कि वहां भैरो सिंह शेखावत बाजी मार ले गए।

भजनलाल 1 जनवरी 1968 को विधानसभा के सदस्य चुने गए। यह कारनामा उन्होंने 5 बार किया। 1 जनवरी 70 को वे प्रदेश के कृषि, सहकारिता व पशुपालन मंत्री बने। लोकसभा से मंत्री बनने के बाद वे राज्यसभा से भी एक बार मंत्री बने। 2007 में उन्होंने हरियाणा जनहित कांग्रेस का गठन किया।

परिचय

जन्म : 6 अक्टूबर 1930
स्थान: बहावलपूर (पाक पंजाब)
सियासी शुरुआत: आदमपुर पंचायत में पंच के रूप में
मुख्यमंत्री पद: दो बार संभाली कमान (1979-85), (1991-96)।

केंद्रीय राजनीति

राजीव गांधी के नेतृत्व वाली भारत सरकार में मंत्री रहे
एक बार राज्यसभा सदस्य भी रहे
आखिरी बार 2009 में हिसार से हजकां के चुनाव चिह्न् पर लोकसभा का चुनाव जीता

आतंकी निशाने पर भी थे

पंजाबी बोली के क्षेत्र और पानी के मुद्दे पर भजनलाल पंजाब के आतंकवादियों के निशाने पर भी रहे। वे 77 में देवीलाल की बहुमत वाली सरकार गिराने के बाद चर्चा में आए। 2005 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाने से खफा होकर भजनलाल ने कांग्रेस ने नाता तोड़ दिया। 2004 में भिवानी लोकसभा सीट से बेटे कुलदीप बिश्नोई को चुनाव लड़ाया। सामने देवीलाल के पोते अजय चौटाला और बंसीलाल के बेटे सुरेंद्र सिंह थे। इस चुनाव में जीत से भजनलाल का नाम और चमक गया।

अधिकारी वर्ग पर पूरी पकड़

भजनलाल के करीबी रहे आईएएस सेवानिवृत्त एलएन मेहता बताते हैं कि उनकी अधिकारी वर्ग पर पूरी पकड़ थी। इंसानियत इतनी कि उनके घर में विशेष आदेश थे कि कोई बिना चाय-पानी न जाए।

लालों पर फिल्म भी बनी

हरियाणा के तीन लालों पर आधारित अनिल कपूर पर फिल्माई गई एक फिल्म भी आई, जो हरियाणा में खूब लोकप्रिय हुई। इस फिल्म में पूरे हरियाणा की सियासत तीनों लालों के इर्द-गिर्द दिखाई गई है।

अनुभवी नेता थे भजन: हुड्डा

सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि भजनलाल एक अनुभवी नेता थे। उनका लंबे समय तक कांग्रेस से संबंध रहा। वे लंबे समय तक हरियाणा प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने पूरा जीवन समाजसेवा में गुजारा, जिनके निधन से हुई क्षति को भरना नामुमकिन है।

दूरदर्शी राजनीतिज्ञ: पहाड़िया

राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया ने भजनलाल के आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भजनलाल एक योग्य सांसद, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने मुख्यमंत्री और अन्य पदों पर रहते हुए कुशल प्रशासक के रूप में छाप छोड़ी है।

हंसमुख स्वभाव था: चौटाला

इनेलो प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला ने कहा कि हरियाणा ने भजनलाल के रूप में एक मृदुभाषी नेता खो दिया है। चौटाला ने भजनलाल को हंसमुख स्वभाव के राजनेता बताते हुए कहा कि उनके निधन से प्रदेश को गहरा झटका लगा है।

अच्छे राजनेता थे: फिजा

भजनलाल के बेटे चंद्रमोहन की पूर्व पत्नी अनुराधा बाली उर्फ फिजा ने कहा कि भजनलाल अच्छे राजनेता थे। उनकी भजनलाल से कई बार बात हुई है। हालांकि फिजा ने भजनलाल के निजी जीवन पर सीधे तौर पर टिप्पणी नहीं की।

इनपुट : प्रकाश बिश्नॊइ (धॊरीम्न्ना)

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नहीं रहे भजन लाल, दिल का दौरा पड़ने से निधन

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हिसार. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद भजन लाल नहीं रहे। वे 81 साल के थे। दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्होंने शहर के एक निजी अस्पताल में शुक्रवार शाम करीब सवा पांच बजे अंतिम सांस ली।

उन्हें तीन घंटे में दो बार दिल का दौरा पड़ा। उन्हें बचाने के लिए चार घंटे प्रयास किए गए, मगर कामयाबी नहीं मिली। उनका अंतिम संस्कार शनिवार शाम पांच बजे उनके गृह क्षेत्र आदमपुर मंडी में किया जाएगा। भजन लाल के निधन पर प्रदेश सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक तथा एक दिन का अवकाश घोषित किया है। भजन लाल हरियाणा के तीन बार मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार में कृषि एवं पर्यावरण मंत्री भी रहे थे।

दोपहर साढ़े 12 बजे जब भजन लाल को सेक्टर 15 स्थित आवास पर दिल का दौरा पड़ा, तब उनके दोनों बेटे हिसार से बाहर थे। अंतिम समय में उनकी पत्नी जसमा देवी उनके साथ थीं। भजन लाल हिसार लोकसभा क्षेत्र से सांसद और हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) के संरक्षक थे। उनके बड़े बेटे चंद्रमोहन प्रदेश के उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके छोटे पुत्र कुलदीप बिश्नोई आदमपुर से विधायक व हजकां के अध्यक्ष हैं। उनकी इकलौती बेटी रोशनी देवी पंजाब में अबोहर के पास सीतोगुना में विवाहित हैं।

25 साल कांग्रेस में रहे

भजन लाल ने 25 साल से ज्यादा कांग्रेस में बिताए। 2005 के चुनाव के बाद जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बना दिया गया तो वे पार्टी से खफा हो गए। हालांकि उनके बड़े बेटे चंद्रमोहन को उप मुख्यमंत्री बनाया गया मगर छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस की खुले तौर पर मुखालफत शुरू कर दी। 2007 में पिता-पुत्र ने कांग्रेस छोड़कर हजकां पार्टी बना ली।

भजनलाल एक योग्य सांसद और लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने कुशल प्रशासक के रूप में अपनी छाप छोड़ी। “”

जगन्नाथ पहाड़िया, राज्यपाल

भजनलाल ने सारा जीवन समाज सेवा में गुजारा। उनके निधन से हुई क्षति को भरना नामुमकिन है।”"

भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मुख्यमंत्री

प्रदेश ने एक मृदुभाषी व सक्रिय राजनेता खो दिया है। भजनलाल हंसमुख स्वभाव के नेता थे।”"

ओमप्रकाश चौटाला, अध्यक्ष, इनेलो

भजन के निधन से राजनीति में खालीपन आ गया। वे सभी को साथ लेकर चलने वाले नेता थे।”"

कृष्णपाल गुर्जर, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा

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‘इंदिरा ने कहा था भजन जहर भी देंगे, तो खा लूंगी’

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वर्ष 1982 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हरियाणा के फतेहाबाद में चुनावी प्रचार के लिए आईं थी तब उनका व्रत था। उस समय फतेहाबाद के टिकटार्थी गोबिंदराय और रतिया के नेकीराम की जनसभा को संबोधित किया था। भजनलाल भी इंदिरा के साथ थे। तब इंदिरा ने भजनलाल को कहा था कि वे कुछ नहीं खाएंगी क्योंकि उनका फास्ट है। तब भजनलाल ने कहा था कि मैडम दूध और दही तो खाकर देखो, ये चीजें तो व्रत के दौरान खाई जा सकती है। जब इंदिरा गांधी भजनलाल के कहने पर दही खाने लगी तो उनके सुरक्षागार्डो ने उन्हें दही खाने से रोक दिया था, इस पर तपाक से इंदिरा ने कहा कि भजनलाल अगर जहर भी देगा तो भी मैं खा लूंगी। ये तो मेरे विश्वासपात्रों में से एक हैं।

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भजनलाल के निधन से बिश्नोई समाज में शोक की लहर

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3 जून। बिश्नोई समाज के एकमात्र ‘बिश्नोई रत्न’ उपाधि से सम्मानित चैधरी भजनलाल बिश्नोई का हृदय गति रूकने से निधन होने की सूचना सम्पूर्ण भारत के बिश्नोई समाज में चन्द मिनटों में ही फैल गई। दूरदर्शन व इण्टरनेट पर खबरों से पहले ही बिश्नोई समाज के गणमान्य लोगों तक मोबाईल फोन के माध्यम से समाचार प्रसारित हो गए।उनके निधन की सूचना से पूरे बिश्नोई समाज में शोक की लहर छा गई। उल्लेखनीय है कि चैधरी भजनलाल ने बिश्नोई समाज तथा बिश्नोई धर्म की उन्नति के लिए अविस्मरणीय सेवाएं प्रदान की है। उनके दूरदर्शी चिन्तन के कारण ही जाम्भोजी की समाधि स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण होने के साथ ही दिल्ली जैसे महानगर में समाज की करोड़ों रूपयों की सम्पति के रूप में छात्रावास,जम्भेश्वर मंदिर एवं धर्मशाला का निर्माण भी विशेष उपलब्धि रहा है। इसके साथ ही उन्होनें बिश्नोई समाज एवं जाम्भोजी द्वारा प्रतिपादित पर्यावरण संरक्षण के सूत्रों एवं पर्यावरण रक्षा की खेजड़ली बलिदान जैसी घटनाओं को भारत की लोकसभा में प्रस्तुत कर विश्वपटल पर चमकाया। जिस समय वे केन्द्र सरकार में कृषि एवं पर्यावरण मंत्री थे, उस वक्त के लोकसभा भाषण में खेजड़ली बलिदान की घटना पर दिया गया भाषण विशेष सम्मानित भाषण घोषित किया गया था।
समाज के विभिन्न प्राचीन स्थलों के जीर्णोद्धार का कार्य भी चैधरी भजनलाल के मार्गदर्शन में अद्भुत तरीके से किया गया। उनकी सेवाएं बिश्नोई समाज की भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहेगी। प्रत्येक बिश्नोई के दिल को जीतने वाले उक्त नेता ने राजनीति में भी अविस्मरणीय सेवाएं दी है। आदि विशेषताओं के कारण आम जनता के साथ ही प्रत्येक बिश्नोई के दिल में उनका स्थान है। उनकी इन विशेषताओं के कारण उनके निधन पर जन जन में शोक की लहर छा गई है। नागौर जिले के बिश्नोई समाज में भी गांव गांव तक उनके निधन की सूचना तुरंत मिल गई। जिसके कारण लोगों ने शोक व्यक्त किया। जिले के गणमान्य लोग बड़ी संख्या में हरियाणा के हिसार शहर स्वर्गीय चैधरी भजनलाल के अन्तिम दर्शनों के लिए जायेंगे।

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